ग्राम सभा में दलित भागीदारी की वास्तविकता और चुनौतियाँ

https://doi.org/10.5281/zenodo.20265436

Authors

  • नीरज कुमार

Abstract

भारत के ग्रामीण लोकतंत्र की आत्मा ग्राम सभा को माना गया है, जहाँ प्रत्येक नागरिक को निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी का अधिकार है। संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण नीति ने दलित वर्ग को स्थानीय शासन में प्रतिनिधित्व का अवसर अवश्य दिया है, परंतु व्यावहारिक स्तर पर यह भागीदारी अभी भी सीमित और प्रतीकात्मक दिखाई देती है। सामाजिक विषमता, जातिगत भेदभाव, आर्थिक निर्भरता तथा राजनीतिक वर्चस्व जैसे कारक दलितों की सक्रिय सहभागिता में बाधा उत्पन्न करते हैं। अनेक बार ग्राम सभाओं में निर्णय प्रक्रिया उच्च वर्ग के प्रभाव में होती है, जिससे दलित समुदाय की आवाज़ या तो दब जाती है या औपचारिकता तक सीमित रह जाती है। इस शोध पत्र में ग्राम सभा में दलित भागीदारी की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करते हुए यह समझने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार संरचनात्मक, सामाजिक और मानसिक अवरोध उनकी वास्तविक भागीदारी में अड़चन बनते हैं। साथ ही, शोध यह भी रेखांकित करता है कि शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और प्रशासनिक पारदर्शिता के माध्यम से इन चुनौतियों को किस हद तक दूर किया जा सकता है, ताकि ग्राम लोकतंत्र वास्तव में सर्वसमावेशी और न्यायसंगत बन सके।
बीज शब्द- ग्राम सभा, दलित भागीदारी, सामाजिक विषमता, आर्थिक निर्भरता, राजनीतिक वर्चस्व, स्थानीय शासन, प्रतिनिधित्व, सामाजिक जागरूकता, प्रशासनिक पारदर्शिता, समावेशी लोकतंत्र।

Downloads

Published

31.03.2026

How to Cite

नीरज कुमार. (2026). ग्राम सभा में दलित भागीदारी की वास्तविकता और चुनौतियाँ: https://doi.org/10.5281/zenodo.20265436. Research Work (a Monthly, Open Access, Peer Reviewed International Journal) EISSN 3139-2377, 2(03), 32–37. Retrieved from https://journalresearchwork.ijarms.org/index.php/rahul/article/view/99

Issue

Section

RESEARCH PAPERS