विकसित भारत/2047रू परिवर्तन की दिशा में संस्कृत और भारतीय संस्कृति की भूमिका

https://doi.org/10.5281/zenodo.20209935

Authors

  • डॉ0 उमा सिंह

Abstract

भारत के विकास का सपना केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है जो सांस्कृतिक रूप से आत्मनिर्भर, नैतिक रूप से दृढ़ और आध्यात्मिक रूप से जागरूक हो। ‘विकसित भारत/2047 केवल आर्थिक सूचकांकों में प्रगति का कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह एक संस्कृति-सापेक्ष राष्ट्रीय पुनर्जागरण का संकल्प है, जिसमें भारत की आत्माकृसंस्कृत और भारतीय संस्कृतिकृकेन्द्रीय भूमिका निभाती है। संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवंत सभ्यता की अभिव्यक्ति है जिसने मानव जीवन के प्रत्येक आयाम -धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- को सुसंगठित रूप में प्रतिपादित किया। भारतीय संस्कृति का यह दर्शन, जो संतुलन और समन्वय की परंपरा पर आधारित है, आज की वैश्विक विकास अवधारणाओं से कहीं अधिक व्यापक और समग्र है। जहाँ पश्चिमी आधुनिकता प्रगति को भौतिक मानकों से मापती है, वहीं भारतीय दृष्टिकोण इसे आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक समरसता से जोड़ता है। इसीलिए ‘विकसित भारत/2047‘ का निर्माण केवल उद्योग, प्रौद्योगिकी और शहरीकरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानवता के पुनर्निर्माण का भी विषय है। संस्कृत ग्रंथों में निहित ज्ञान-चाहे वह ऋग्वेद का वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो, उपनिषदों का आत्मबोध, या महाभारत और रामायण की नैतिक चेतना-आज भी विकास के मार्ग को दिशा प्रदान कर सकते हैं। संस्कृत की यह ज्ञान परंपरा केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि समकालीन भारत के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स के लिए एक वैकल्पिक सांस्कृतिक रूपरेखा प्रस्तुत करती है। नीति आयोग-2021 के विजन डाक्यूमेन्ट फॉर इण्डिया/2047 में भी इस बात का संकेत मिलता है कि भारत की विकास यात्रा तभी संतुलित और टिकाऊ होगी जब इसमें सांस्कृतिक पूँजी और मानवीय मूल्य का समावेश किया जाए। इस दृष्टि से संस्कृत और भारतीय संस्कृति केवल परंपरा का प्रतीक नहीं, बल्कि विकास की आत्मा और दिशा हैं।
संस्कृत के पुनर्जागरण से न केवल भाषा-संरक्षण होगा, बल्कि भारतीय दर्शन, साहित्य, विज्ञान और नैतिकता के उन स्त्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सकेगा जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ की नींव बन सकते हैं। संस्कृत की तार्किकता, व्याकरणिक शुद्धता और वैज्ञानिक संरचना (पाणिनि अष्टाध्यायी से प्रेरित) इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता और कम्यूटेशनल लिंग्यूस्टिक जैसे क्षेत्रों में भी प्रासंगिक बनाती है। इस प्रकार, यह केवल प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भविष्य के भारत के ज्ञान अवसंरचना की संभावित धुरी है। भारतीय संस्कृति की दृष्टि में विकास का अर्थ केवल भौतिक उन्नति नहीं, बल्कि ‘पुरुषार्थ चतुष्टय-’धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष‘-के संतुलित अनुसरण में निहित है। यह अवधारणा विकास को मानवीय और नैतिक धरातल पर पुनर्परिभाषित करती है। अतः ‘विकसित भारत/2047‘ का वास्तविक अर्थ होगा-सांस्कृतिक रूप से विकसित, सामाजिक रूप से समरस और आध्यात्मिक रूप से संपन्न भारत।
प्रस्तुत शोध पत्र विकसित भारत की अवधारणा में संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति की भूमिका की विस्तार सेे विश्लेषणात्मक तरीकेे से अध्ययन करता है।
मुख्य बिन्दुः विकसित भारत/2047, भारतीय दर्शन, साहित्य, विज्ञान, नैतिकता, संस्कृत, संस्कृति, भाषा-संरक्षण।

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Published

28.02.2026

How to Cite

डॉ0 उमा सिंह. (2026). विकसित भारत/2047रू परिवर्तन की दिशा में संस्कृत और भारतीय संस्कृति की भूमिका: https://doi.org/10.5281/zenodo.20209935. Research Work (a Monthly, Open Access, Peer Reviewed International Journal) EISSN 3139-2377, 2(02), 1–10. Retrieved from https://journalresearchwork.ijarms.org/index.php/rahul/article/view/86

Issue

Section

RESEARCH PAPERS