ग्रामीण शासन में विकेन्द्रीकरण और सहभागितामूलक लोकतंत्र
https://doi.org/10.5281/zenodo.20437954
Abstract
भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में शासन की सफलता का आधार जनता की सक्रिय भागीदारी है। लोकतंत्र तभी सशक्त होता है जब सत्ता के विकेन्द्रीकरण द्वारा निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया स्थानीय स्तर तक पहुँचे और नागरिकों को शासन के प्रत्येक चरण में शामिल किया जाए। विकेन्द्रीकरण का आशय केवल प्रशासनिक अधिकारों के हस्तांतरण से नहीं बल्कि यह एक सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से नागरिक शासन के साझेदार बनते हैं। ग्रामीण भारत में पंचायती राज प्रणाली इस विकेन्द्रीकरण की व्यवहारिक अभिव्यक्ति है। 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया, जिससे स्थानीय स्वशासन की जड़ें मजबूत हुईं। इस संशोधन ने ग्राम सभा को लोकतंत्र की आधारशिला बनाते हुए नागरिक सहभागिता की प्रक्रिया को संस्थागत रूप दिया। हालाँकि, आज भी ग्रामीण शासन में नागरिक सहभागिता को अनेक चुनौतियाँकृ जैसे सामाजिक असमानता, अशिक्षा, राजनीतिक हस्तक्षेप और संस्थागत कमजोरीकृ का सामना करना पड़ता है। इस शोध-पत्र में विकेन्द्रीकरण और नागरिक सहभागिता की अवधारणा, भारतीय परिप्रेक्ष्य में उनका विकास, वर्तमान चुनौतियाँ और संभावित समाधान पर विस्तृत विवेचन किया गया है।
मुख्य शब्दः विकेन्द्रीयकरण, सहभागितामूलक लोकतंत्र, पंचायती राज, स्थानीय शासन, नागरिक सहभागिता।
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Copyright (c) 2026 Research Work (a Monthly, Open Access, Peer Reviewed International Journal) eISSN 3139-2377

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